धूप छांव सी मोहब्बतें- भाग 2(महात्मा)

जिस तरह लड़कियों का बदचलन कहलाया जाना अपने आप में एक बहस का विषय है उसी तरह लड़कों का महात्मा कहलाया जाना भी एक बहस का विषय है।

हमारे समाज ने पुरुषों का इतना मान हनन कर दिया है कि अब पुरुष वर्ग के लिए महात्मा शब्द एक व्यंग की तरह हो गया है और राजवीर इस व्यंग का जीता जागता उदाहरण था। उसका नाम राजवीर से महात्मा ही पड़ चुका था।

बचपन में ही माँ के देहांत के बाद पिता के अत्यधिक अनुशासन ने उसे न केवल शरीर से अपितु मन से भी कठोर बना दिया था। उसके लिए जीवन का एक मात्र अर्थ बस दायित्वों का निर्वाह बन चुका था।

जब राजवीर बारहवीं में था तो उसकी ही कक्षा की एक लड़की को उससे प्रेम हो गया था। मन से कहीं न कहीं राजवीर को भी कुछ तो स्नेह था पर उसने न कभी जाहिर किया न कभी उस लड़की का प्रस्ताव ही स्वीकारा। उसके मन के किसी कौने में ये बात बैठी हुई थी कि सही समय पर वह अपने मन को टटोल कर सही निर्णय लेगा। समय लेकिन कब सही आता है? कुछ महीनों बाद ही उसके सबसे प्रिय मित्र ने उस लड़की को अपनी गर्लफ्रैंड बना लिया था और जैसा होता हमेशा ही दोस्ती और प्रेम(मोह) में जीत हमेशा प्रेम की होती है।

उसके मन में खटास नहीं थी पर हां वो किवाड़ थोड़ी और सख़्ती से बन्द हो गयी थी जिस के रास्ते प्रेम का आगमन हो सकता था। उसके दोस्तों ने उसे लताड़ा, और मज़ाक भी बनाया पर ये सब अब आम बात थी।

कॉलेज के दिनों में फिर एक बार राजवीर का सामना प्रेम से हुआ और इस बार उसके प्रेम में पड़ने वाली युवती आत्महत्या के मार्ग पर चल पड़ी थी। उसको बचाने के लिए प्रेम ही एकमात्र तरीका था जो राजवीर ने इख्तियार किया। प्रेम पेंगे लेने लगा और राजवीर अपना दायत्व समझ कर उसे निभाने लगा।

कॉलेज के खत्म होने के बाद राजवीर अपनी प्रेयसी सुनन्दा के कहने पर उसके घर गया। राजवीर जैसे लड़के भले ही अपनी हमउम्र के लोगों में मज़ाक बन कर रह जाते हों पर बुजुर्गों की नज़र में वही सही रास्ते पर चलने वाले होते हैं। ये तो मुमकिन था ही नहीं कि सुनन्दा के घर वाले राजवीर को खारिज़ कर देते। तो हुआ यूँ कि उसकी और सुनन्दा की शादी तय हो गयी। सुनन्दा के माता पिता की अनुमति मिल चुकी थी, राजवीर के पिता को बस बेटे का घर बसा हुआ देखना था जिसकी इज़ाज़त उन्होंने फ़ोन पर ही दे दी थी। सब ख़ुश थे पर भीतर एक चित्तकार रह रह कर उठती थी राजवीर के, जिसे वो चुप कराने में हमेशा से सक्षम था पर आज जाने क्यों वह चित्तकार कुछ सम्भल नहीं पा रही थी उससे।

वह तेज कदमों से बढ़ता हुआ बस स्टैंड पहुंचा। घर वापसी की टिकट ली और बस में बैठ गया।

इस बस की, इसी सीट पर खिड़की के बाहर झांकती रितिका अपने अतीत में खोई हुई थी और उसके बगल में बैठा राजवीर अपने भविष्य के बारे में सोच सोच कर परेशान हुआ जा रहा था। दो मुसाफ़िल एक ही बस, एक ही सीट पर दो अलग अलग समय की यात्रा पर निकल पड़े थे, बिना ये जाने समझे कि नियति ने उन्हें मिलाने के लिए ही सारे पडयंत्र रचे हैं।

बस अपने गंतव्य के लिए निकल पड़ी। देर रात का सफर था, पूरी बस में उन दोनों के सिवा बस ड्राइवर और कंडक्टर ही जाग रहे थे। रोशनी धीमी थी तो राजवीर से कुछ पढा भी नहीं जा रहा था। बगल में बैठी लड़की की ओर से खिड़की से बाहर देखना भी उठाने उचित नहीं समझा। अपने ख़यालों से बाहर जब आयी रितिका तो ख़ुद ही पूछी

-पानी होगा आपके पास
-जी (कहते हुए राजवीर ने पानी की बोतल उसे थमा दी)

रितिका के हाथों पर अब भी आटा लगा हुआ था। राजवीर की नज़र उसके हाथों पर पड़ी तो उसके मुँह से निकल गया

– आप ठीक हैं?
– हम्म(पानी की बोतल लौटाते हुए रितिका बोली)
– ये हाथों पर आटा… मेरा मतलब है…ऐसे अचानक कोई नहीं निकलता घर से
– घर से नहीं निकली हूँ, घर के लिए निकली हूँ(बड़ी बेरुखी से बोली थी वो)
– जी, सॉरी
– सिगरेट पीते हो?
– जी?
– अरे सिगरेट पीते हो?
– नहीं
– अच्छा, महात्मा हो ?(अनजाने में ही उसने राजवीर के ज़ख्म को छू लिया था)
– जी नहीं(गुस्से को दबाता हुआ राजवीर बोला)

और एक शरारती मुस्कुराहट के साथ रितिका फिर से बाहर देखने लगी।

राजवीर आँखें बन्द करके बैठ गया। सोचने लगा क्या उसे सुनन्दा से प्यार है? फिर ख़ुद ही जवाब दिया “हां है”
– पर अगर प्यार है तो शादी से परेशानी क्या है
– परेशानी कुछ नहीं, पर पहले अपने पैरों पर खड़ा तो हो जाए
– पिता का अच्छा खासा चलता काम है, नौकरी करने की जरूरत तो कभी थी ही नहीं
– पर जिसको पत्नी बना कर घर ला रहा हूँ उसकी जिम्मेदारी तो मेरी ही है न
– पापा के काम में भी तो हाथ बढ़ाया जा सकता है
– क्या वो पापा और उनके आदर्श समझ पाएगी
– ये सब पहले सोचना था, प्यार करने से पहले
– पर मैंने प्यार नहीं किया

ये ख़याल आते ही राजवीर हड़बड़ा गया और इस बार मन में नहीं उसके बोल होठों से फूटे

“मैं सुनन्दा से प्यार करता हूँ”

– जब ख़ुद को समझाना पड़े तो वो प्यार नहीं मजबूरी होती है

रितिका की आवाज़ उस समय राजवीर को अपने ही अन्तस् की आवाज़ लग रही थी और उस अंधेरी रात में बातों का एक जो सिलसिला शुरू हुआ शायद कभी नहीं थमने वाला था।

राजवीर ने रितिका को अपनी कहानी सुनाई। बताया कि पांच साल से साथ रह रही लड़की के लिए उसके दिल में इज़्ज़त है, उसकी चिंता भी है, उस पर भरोसा भी करता है पर कुछ कचोटता है उसको, प्यार व्यार जैसा कुछ सोचा नहीं उसने कभी पर उसको ऐसे जीने में भी दिक्कत नहीं। पर शायद घर में कभी किसी स्त्री को देखा नहीं तो जीवनमें स्त्री के आने से डर रहा है। ऐसे भी रोज़ के 2 घण्टे साथ बिताने में और 24 घण्टे साथ रहने में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ होता है।

रितिका  ने सब कुछ बड़े इत्मीनान से सुना और कहा कि वह कुछ समय माँगे… ये कह कर नहीं कि उसे सोचने के लिए समय चाहिए बल्कि कोई ऐसा काम खोजे जिसके लिए उसे कुछ समय के लिए सुनन्दा से दूर रहना पड़े। ऐसे में राजवीर को ही नहीं सुनन्दा को भी सोचने का समय मिलेगा। हो सकता है राजवीर को उसकी एहमियत का अहसास हो जाए या फिर सुनन्दा को ही लगने लगे कि फोर्सफुली उसने जो किया था वो पागलपन है। राजवीर को बात जम गयी।

अब बारी रितिका की थी अपनी कहानी सुनाने की तो उसने बस इतना कहा कि उसे प्यार नाम के खिलौने से खेलने की आदत है और अपने आप पर हंसते हुए राजवीर को अपना नंबर दे कर बोली

“कभी प्यार को निभाने की जगह प्यार से खेलने का मन हो तो फ़ोन करना”

रात ढल चुकी थी…स्टैंड आ गया था और दोनों मुसाफ़िर कभी न मिलने के लिए अलविदा कह चुके थे। पर मिलना बिछड़ना मुसाफिरों के हाथ कहाँ होता है न?

धूप छांव सी मोहब्बतें- भाग 1(तवायफ़)

किसी को तवायफ़ कह देना कितना आसान है, पर उसी तवायफ़ के जिस्म की एक परत के लिए छटपटाना और उसे तरकीबें लगा कर पाने की कोशिश करना थोड़ा मुश्किल है… हैं न? वो भी अगर जिसे  तवायफ़ समझ तो सकते हैं पर खरीद नहीं सकते। उसको पाने के लिए कितने हतकंडे अपनाए जाते हैं। फ्री का माल सबको चाहिए।

तवायफ़ शब्द उसके लिए कोई नया शब्द तो था नहीं जो सुने और रो पड़े। उसने 10वीं कक्षा से इस शब्द को और इसके पर्यायवाची कई शब्दों को बार बार सुना था। इतनी बार की अब उसे ये शब्द गाली जैसा लगना बन्द हो चुका था।

रितिका को आज उसके चाचा ने भी जब यही शब्द कहे तो उसे बुरा नहीं लगा। हां उसकी चाल थोड़ी और दृढ़ हो गयी और वो वहां से चल पड़ी। उसने चाची के आने का भी इंतज़ार नहीं किया, करती भी क्यों? यहां उसकी देह पर गिद्ध की तरह मंडराता हुआ चाचा खड़ा था वहां वो रिश्तेदारी कैसे निभाती।

बस में बैठी घर को जाती हुई रितिका याद कर रही थी बचपन की वो दहलीज़ जिसको लांघते हुए उसके पैर पर एक जरा सी मोच क्या आ गयी सबने उसके चलने पर ही लांछन लगा दिया।

दसवीं के दिन थे… उसका ट्यूशन लगा था शहर के सबसे अच्छे मैथ्स टीचर के पास। मैथ्स में बहुत कमज़ोर थी रितिका अब तक तो पापा घर में जैसे तैसे पढा देते थे पर इन बार बोर्ड था और वो चांस नहीं लेना चाहते थे। इतना पढ़ाने के बाद भी उसके कभी 40 से ज़्यादा नंबर नहीं आये थे मैथ्स में।

ट्यूशन के पहले दिन ही उसकी और बैच के सबके स्मार्ट लड़के की नज़र टकरा गयी थी। प्यार नाम की मकड़ी ने जाल बुनना शुरू कर दिया था। ये उम्र का वो दौर था जब हर लड़की दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे के राज़ के सपने देख रही होती है उस पर अगर किसी को राज़ नाम का, राज़ जैसी सूरत और राज़ जैसी मोहब्बत करने वाला लड़का मिल जाए तो किसे प्यार नहीं हो जाएगा। ये और बात है कि राज़ बस फिल्मों में ही हर मुश्किल हर हाल में साथ रह सकता है। असल ज़िन्दगी में राज़ तब तक ही साथ है, जब तक उसका साथ सबसे एक राज़ है।

राज़ का साथ दसवीं तक भी नहीं चला। प्रेम वश एक दिन जब दोनों प्रेमवश एक दूसरे के अधरों का स्वाद चखने के लिए उतावले हो कर ट्यूशन की दीवार के पीछे अंधेर में खड़े थे तो उनके उस प्रथम मिलन पर ही टीचर की नज़र पड़ गयी थी। दोनों के माता पिता को बुला कर शिकायत की गयी। दोस्तों के सामने हंसी उड़ी और घर जा कर पिता से एक थप्पड़ भी खाया।

बात यहां ओर ख़त्म हो जाती तो भी कोई बात नहीं थी पर रितिका भूल गयी कि उसका नाम रितिका है सिमरन नहीं। और वो सिमरन की तरह पहुँच गयी राज़ के कमरे में। हुआ कुछ नहीं उन दोनों के बीच पर इस देश में लड़का रेप भी कर ले तो घर की इज़्ज़त पर आंच नहीं आती और लड़की बीच सड़क किसी लड़के का हाथ पकड़ ले तो घर की इज़्ज़त भी नीलाम हो जाती है।

उस दिन बहुत बवाल हुआ था। माँ के मुंह से तब उसने पहली बार तवायफ़ शब्द सुना था। पिटाई इतनी जबरदस्त हुई थी कि एग्जाम भी नहीं दे पाई। सारे दोस्त ग्यारहवीं में पहुंच गए थे और वो बिना फैल हुए भी फैल हो चुकी थी। प्यार अब भी ज़िंदा था कहीं इसलिए नए सेशन की शुरुआत में उसने अपना पहला प्रेम पत्र लिखा था। जिसमें उसने साफ़ साफ लिखा था “राज़ मैं तुम्हारे बग़ैर मर जाऊँगी”

राज़ तक वो ख़त पहुंचा तो ज़रूर पर तब तक राज़ की ज़िन्दगी में कोई और सिमरन आ चुकी थी और वो रितिक जैसी बेहया लड़की से जितनी हो सके उतनी दूरी रखना चाहता था। उसके पेरेंट्स और दोस्तों के अनुसार तो रितिका ही उसके पीछे पड़ी रहती थी। बहुत रोयी रितिका। न घर में कोई था समझने वाला, न कोई दोस्त, एक दो जो दोस्त थे उनके भी माता पिता की सख़्त हिदायत थी कि इतनी बिगड़ी लड़की के साथ नहीं रहना।

ग्यारहवीं के दिनों में अक्सर उसे क्लास के बच्चे चिढ़ाया करते थे। प्रेम ने उसको एक गुनहगार बना कर रख दिया था और उसे समझ भी नहीं आता था उसका गुनाह क्या है। घूम डर कर उसकी सुई प्यार पर ही अटक जाती। वो गाने सुनती और फिर ख़ुद को देखती राज़ के साथ, फिर सर झटक देती ये सोच कर की राज़ को तो उससे प्यार ही नहीं।

प्यार उसके के जीवन की मृगतृष्णा बन चुका था। और तभी घर के पड़ोस में एक नए राज़ का आना हुआ। नाम उसका प्रेरित था। प्रेरित कॉलेज स्टूडेंट था। कॉलेज के पास बस यहीं उसे कराए पर मकान मिला था। अकेला रहता था, उसके आने पर थोड़ा बहुत बवाल हुआ कॉलोनी वालों का पर जिस घर में वो रह रहा था वो उसके जानपहचान वालों का ही था तो बस बातें उठी और बैठ गयी। कायदे से ज़िम्मेदारी मकान मालिक की थी, पर लड़कों की जिम्मेदारी कौंन लेता है।

छज़्जे वाली मोहब्बत के भी अपने ही रंग होते हैं। प्रेरित छत में बैठा पढ़ रहा होता था शाम को और अगर कपड़े उठाने रितिका आ जाए तो उसके टेपरिकॉर्डर पर गाने की आवाज़ थोड़ी तेज़ हो जाती। शुरू में रितिका ने ध्यान नहीं दिया। देती भी क्यों वो तो राज़ की सिमरन थी पर धीरे धीरे उसको महसूस होने लगा जब माँ के साथ वो छत पर जाती है तो लड़का उनकी छत की तरफ पीठ करके बैठ जाता है पर जब अकेली जाती है तो मुंडेर तक घूमता हुआ पढ़ता है।

छज़्ज़े वाली मोहब्बत में मैथ्स ने एक बार फिर मदद करने की ठानी और हुआ ये कि किसी प्रश्न को सॉल्व करने के लिए देर रात में रितिका पापा का सर खाने लगी, जब सामने वाले अंकल घर ही आये हुए थे। बातों बातों में उनके मुँह से निकल गया “प्रेरित भैया से पूछ लो”

रितिका को तो बस प्रेरित सुनाई आया।भैया तो अंकल ने बोला था उसने नहीं। अंकल का छोटा बेटा जो अभी दूसरी में था रितिका को लेकर घर चला गया। बात तो बस मैथ्स की ही थी और प्रॉब्लम भी सॉल्व हो गयी थी पर उनके घर के दरवाजे एक दूसरे के लिए खुल गए थे। ऊपर से दोनों घरों की नज़र में वो दोनों भाई बहन बन ही चुके थे।

माता पिता भी कितने भोले होते हैं जो सोचते हैं हम ने बच्चों को भाई-बहन कह दिया तो वो सच में भाई बहन बन जाएंगे। ये शायद कुछ केसेस में ठीक भी हो ओर यहां पूरी तरह गलत था।

दोनों के बीच मेल जोल बढ़ा और इतना बढ़ा की एक दिन रितिका गर्भवती हो गयी। बुरा ये हुआ कि प्रेरित ये बात सुनते ही रातों रात भाग गया और अच्छा ये हुआ कि रितिका की बात बाहर फैलती इससे पहले ही माँ को पता चल गया और उन्होंने उसे चाचा-चाची के पास एबॉर्शन के लिए भिजवा दिया। तब फिर एक बार उसका सामना तवायफ़ शब्द से हुआ था। चाचा की नज़र भी तब उसने पहली बार बदली देखी थी। जिन चाचा का हाथ उसके सर पर रहा है हमेशा उसको उसने खिसकते देखा था। पर दर्द, दुख और मजबूरी ने उसको ध्यान नहीं देने दिया। चाची वैसे भी उस समय साथ ही सोती थी उसके तो एक दूरी बनी ही रही।

रिश्तेदारों… दोस्तों… पड़ोसियों में उसको हीं भावना से देखा जाने लगा था। पर प्यार एक ऐसा बुखार होता है जो चढ़ता है तो जब तक पूरा अस्तित्व न तोड़ दे उतरता भी नहीं।

कॉलेज के पहले साल में रितिका इतनी समझदार हो गयी थी कि अपनी सुंदरता की तारीफ करते लड़को को कब कितना बहलाना है और कैसे काम निकलवाना है वो जान चुकी थी। जितनी चपल वो अपने व्यवहार में हो रही थी उतनी ही ज़्यादा उनके चर्चे भी हो रहे थे।माता-पिता एक योग्य वर की तलाश में लग चुके थे।

अब समीकरण बदल गए थे। जो रितिका अब तक खिलौना थी वो खिलाड़ी बन चुकी थी। थोड़ी कच्ची खिलाड़ी थी पर खिलाड़ी थी। उसे पलट कर जवाब देना आ गया था, अपने किस्सों को सुनकर हंसना भी आ गया था और एक साथ दो तीन लड़कों को घुमाना भी।

उन दिनों उसकी चाची का एक्सीडेंट हुआ था। चाचा-चाची की कोई औलाद नहीं थी और रितिका के कॉलेज की छुट्टियां भी चल रही थी तो माँ ने कुछ दिनों के लिए चाची की मदद के लिए उसे भेज दिया था।

कुछ दिन गुज़र गए थे…चाची थोड़ा बहुत चलने लगी थी। चाची के पड़ोस में किसी की लडक़ी ससुराल से आयी थी जिनसे चाची मिल नहीं पाई थी और वह लड़की अगले दिन सुबह जाने वाली थी। रितिका चाची को लेकर पड़ोस में गयी और फिर उन्हें वहीं छोड़ कर सब्जी रखने के लिए वापिस आयी थी। जब किचन में उसके चाचा ने उसको पीछे से आ कर पकड़ लिया।

वो चिल्लाई नहीं पर उसने चाचा का हाथ छुड़ा कर कहा
– ये मैं हूँ चाचा
– जानता हूँ
– तो फिर
– तुझे समझा रहा हूँ
– क्या?
– लड़कों और मर्दों का अंतर
– मुझे अंतर पता है
– तो चल
– बेटी नहीं हूँ तुम्हारी
– बेटी जो होती तो उस दिन ही काट दिया होता तुझे जब तू पेट फुला कर यहां आयी थी। बेटी नहीं .#^$&%  है तू

वो हंसी… खूब हंसी और बोली “तुझ जैसों को मेरी परछाई भी छूने नहीं मिल सकती”

पर चाचा के भीतर का मर्द जब बर्दाश्त नहीं कर पाया उस हंसी को तो उसने उसे दबोचना चाहा पर रितिका अब कमज़ोर नहीं थी। खिलाड़ी थी, खिलौना नहीं थी। इएलिये उसने चाकू की एक धार चाचा के हाथ पर लगा दी और उस शब्द के साथ निकल गयी वापिस अपने घर को, बिना चाची का इंतज़ार किये।

अवांछित

श्रृंगार से प्रेम कैसे किया जा सकता है?
मैं अक्सर सोचती हूँ
पढ़ते हुए श्रृंगार रस की कविताएं
कैसे प्रेमिका के वक्षस्थल पर सर रख कर
सुनी तो जा सकती है उसकी धड़कने
पर उन धड़कनों में प्रेषित
ड़र का अनुभव नहीं किया जा सकता
कैसे पायल पहनाते हुए चूमे जा सकते है पैर
ओर पैरों में पड़ी बेड़ियों को
अनदेखा किया जा सकता है
कंपकपाते हुए अधरों को चूमते हुए
क्यों नहीं सुन पाता कोई मौन चीखों का स्वर

मेरे अपने विचार है प्रेम के
और मेरे उन विचारों के अनुसार
जिन अश्रुओं को देखे बिना भी
हज़ारों मिलों की दूरी पर भी द्रवित हो ह्रदय तुम्हारा
जिस व्यक्ति को छुए बिना भी
जान सको तुम उसके मन की सूक्ष्म से सूक्ष्म पीड़ा
जो कहे तुमसे भले कुछ नहीं
पर समझ सको मौन तुम जिसका
जिसको भोगने के क्षण भी
तुम निरंतर उसकी धड़कनों के भय और संताप को
सुन कर भूल जाओ अपनी तृष्णा
और बंधा पाओ उसको धैर्य
तब शायद तुम प्रेम में हो

पर मैंने ऐसा कोई, कभी देखा ही नहीं
या तो मेरे विचारों में कोई दोष है
या फिर प्रेम इस संसार की वस्तु ही नहीं
जिस प्रेम की मैंने कल्पना की है
उस प्रेम ने मुझे कभी इतनी स्वतंत्रता भी नहीं दी
कि मैं समझ सकूँ उसके सिवा
कोई और भाव प्रेम का

मैंने कभी प्रेम नहीं किया
न मुझसे हो पाया कभी किसी को प्रेम
अपनी ही बनाई परिभाषा ने सिखाया मुझे
मैं प्रेम के और प्रेम मेरे लायक
कभी हुआ ही नहीं।

आत्माएं जो यहां की नहीं

कुछ आत्माएं होती हैं ऐसी भी
जो रहती तो हैं समय के इस पार की देह में
पर जिनकी स्मृतियाँ
समय के उस पार के संसार की होती है
उन्हें प्रिया होती है भूमिजा
पर खोजती रहती हैं उनकी आंखें
अपना स्थान आसमान के द्वार में

वो अंधेरे में खोजती हैं मार्ग अपना
उन्हें धूप से मिलती है उर्ज़ा
बरसते हुए बादलों में
पढती हैं वो किसी और भाषा
किसी और लिपि की चिट्ठियां

जब रातें गहरी और ठंडी हो जाती हैं
उन्हें पैरों की उंगलियों की सूजन याद दिलाती है
सूर्य के भीतर भी एक संसार है
जिसको बचाये रखने के लिए
उन्होंने चुन लिया था आना यहां

कितनी दूर होगा घर उनका
अक्सर वो गिनती रहती हैं
पलकों की झपझपाहट में
अनन्त प्रकाश वर्षों की दूरियां

उनसे प्रेम कर लेता है हर कोई
पर वो सबकी हो कर भी
नहीं हो पाती किसी की भी

वो आत्माएं जानती हैं दूर… बहुत दूर…
जहां समय की सीमा रेखा का होगा अंतिम निशान
उस के पार कहीं, कोई उनका अपना
देख रहा है राह उनकी
जिसके पास लौट जाना ही
उनका अंतिम ध्येय है

कोई नहीं समझेगा उनकी बातें
वो आत्माएं… मुस्कुराती मिलेंगी
हंसती, गुनगुनाती मिलेंगी
पर उनकी आंखों में जब भी देखोगे तुम,पाओगे
जीवन वेणी में गुथी सांसों के बीच
रहता है उन आंखों के श्वेत विवर में
शाश्वतता का एक कृष्ण विवर।

परवाज़- भाग 4(पुनरागमन)

जाना संकेत है लौट आने का… किसी का भी जाना तब तक पूरी तरह से जाना नहीं होता जब तक उसके द्वारा दिए गए और लिए गए ऋणों का पूर्ण भुगताना नहीं हो जाता। लौट कर आना भले ही नए रंग नए रूप में हो पर लौट कर आना ही होता है।

एक सफ़ेद रोशनी थी… जिसमें से कुछ उतर रहा था… कोई आकृति नहीं थी पर मैं उसे देख पा रही थी। सम्भवतः ये किसी नए मेहमान के आने का संकेत था? मैंने एक मित्र को मैसेज किया…जिन से मैं अपने सपने(उटपटांग) बिना किसी सोच विचार के कर पाती हूँ।

– यार आज एक अजीब सपना देखा
– क्या

उसके बाद मैंने अपना सपना विस्तार से बताया। और पूछा क्या हो सकता है
-आपको क्या लग रहा है
-शायद प्रिबर्थ टाइप कुछ था पर मैं देख पा रही थी, मैं ही थी या तो या फिर कोई आने वाला है

बात करने के कुछ देर बाद एक फ़ोन आया अनजान नंबर से। फ़ोन पर किसी की सिसकियाँ सुनाई दे रही थी।

– कौन बोल रहा है?
(उन्होंने अपना नाम बताया और रोते हुए कहा)
– शिवांश तुम्हें माँ कहता था न, बहुत दर्द में है वो, बहुत ज़्यादा। उसके लिए प्रार्थना कर लो प्लीज

मैं शांत थी और चुप भी। अचानक से ये सुन कर न रो सकी न कुछ कह सकी। कुछ ही दिन पहले तक शिवांश से बात चल रही थी, फिर मैं अपनी ही तबीयत के चलते बात नहीं कर पाई। शिवांश से हुई बातें दिमाग में घूमने लगी। उससे मैंने उसकी मेडिकल रिपोर्ट मांगी थी जो वो दे नहीं पाया था। उसने कहानी लिखने को कहा था जो मैंने टाल दिया था। वो हिम्मत हार रहा था… और मैं अपनी तबीयत से जूझ रही थी।

जब वो हॉस्पिटल में एडमिट हो गया था तब उसने कहा था

– बड़ी फैशनेबल बीमारी लगी है हमें

हम उस बीमारी को लेकर हंसे थे… बहुत हंसे थे। वहां एक जूनियर डॉक्टर थी जिसके बारे में उसने कहा था

– हमारी डॉक्टर बहुत खूबसूरत है, जूनियर है अभी
– फिर तो आप जल्दी ठीक हो जाएंगे
– गारेंटी ठीक हो जाएंगे

गारेंटी किस की थी पता नहीं। पर खोखली निकली।

फोन पर सिसकियाँ तेज हो रही थी। तो ध्यान फिर फ़ोन पर गया वो कह रही थीं..

-उसे ICU ले गए हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा किस से बात करूँ…क्या बात करूँ

दो लोग एक साथ कमज़ोर पड़ जाएं तो सम्भालेगा कौन। मैंने उन्हें कहा मैं माता के दरबार जा रही हूँ…उन्होंने कभी मुझे निराश नहीं किया… इस बार भी नहीं करेंगी।

देर तक मैं सन्नाटे में बैठी रही। पिछले दो मैसेज के उसके जवाब नहीं आये थे। वो ठीक होने लग था तो चिंता नहीं की उतनी ऊपर से ख़ुद डॉक्टर के चक्कर कट रहे थे। मुश्किल से चलने फिरने लायक हुई थी तो माँ के दरबार जाने का अचानक ही निश्चय किया गया था।

जम्मू की सीमा में प्रवेश करते ही फ़ोन का नेटवर्क बन्द हो गया। अब माँ के सिवा कोई सहारा भी नहीं था। बस साथ में सपने थे और एक विश्वास। पर सपनों में अब शिवांश नहीं आता। आता है एक नन्हा सा बालक और एक दोस्त… जितना मैं शिवांश को सोचती हूँ उतना मुझे नाम तो उसका सुनाई देता है पर दोस्त अपनी दिखती है।

माँ के दरबार में बहुतों की अर्जी ले कर गयी थी। जानती थी वहां इतना समय नहीं होगा कि सबके नाम लिए जा सकें पर जिस समय आखरी मोड़ पर पहुंची सबके नाम मन में लेकर माँ को प्रणाम किया…कह दिया सबकी अर्ज़ियाँ देख लेना। जब माँ सामने पहुंची तो मन से बस इतना निकला “उसे पीड़ा से मुक्त करना माँ”

मुक्ति के कई अर्थ होते हैं। हम अपनों से ज़्यादा उन्हें देख कर जो अपने को पीड़ा होती है उसका निवारण चाहते हैं। पर वो तो सब जानती हैं न? रात में 2 बजे लौट कर आना हुआ, सुबह सुबह की ट्रैन थी वापसी की। पर मन अचानक शांत हो गया था।

दो दिन बाद उनसे बात हुई। और पता लगा जिस समय मैं माँ के दरबार में थी वो भी पीड़ा से मुक्ति पा कर माँ के पास जा चुका था। माँ ने हमेशा हर बात सुनी है मेरी… पर इतनी जल्दी और इस तरह पीड़ा का निवारण भी होता है पता नहीं था।

मुझे दुःख नहीं हुआ… बिलकुल भी नहीं। मैं रोयी नहीं…जरा सा गला भर्राया था उसकी उन बात करते हुए। कभी कभी शून्य में ताकने लगती थी। मन भरा कई बार पर आंसू नहीं आये। बस एक अपराध बोध था कि मैंने उसकी पूरी कहानी सुनने से पहले ही उसे डांट कर चुप करा दिया था। मैं चाहती थी वो सकारात्मक रहे… मैं चाहती थी वो ठीक हो जाए। पर वो जानता था उसके पास समय सच में बहुत कम है।

वो चाहता था उसके जाने का शोक न मनाया जाए। उसे ज़िंदा रखा जाए उसी तरह जैसे वो आस पास ही है। वो नहीं चाहता था लोग RIP जैसे वाहियात शब्दों का प्रयोग करें उसके विषय में। इसलिए मैंने बस उसकी माँ की हालत जानने के लिए एक शख्स से बात की। उसके बाद उसे हमेशा उसकी तरह रहने दिया। जिस किसी ने पूछा उसे वही जवाब दिया जो वो चाहता था। पर जो मेरे मन में घूम रहा था उसका क्या।

उसकी दोस्ती औघड़ों से बड़ी होती थी।  शमशानी बाबा की तस्वीर दिखा कर एक बार उसने कहा था

– जीवन का सच यहीं जा कर देखने मिलता है, ईश्वर कितना छोटा है तब पता लगता है जब धूं धूं करके जलती हुई चिता में उसकी सबसे खूबसूरत कीर्ति जलकर भस्म हो जाती है

बाबा से उसे अलग किस्म लगाव था। शायद इसलिए कि बाबा उसे जीवन का सच बताते थे, या शायद इसलिए कि बाबा उसके जीवन के मोह को धिक्कारते थे या फिर शायद इसलिए कि बाबा उसको समझ पाते थे जो कभी कोई नहीं समझ पाया। इसलिए बाबा उसे शिव का अंश शिवांश कहते थे। उसने जीवन एक ऋण की तरह जिया और ऋण की तरह ही उतार कर चला गया।

लोग भागते हैं मिट्टी की देह के पीछे… क्या मिलता होगा… इस हाड़ मांस के पुतले में अगर उसका दिल न धड़के, अगर भावनाएं सब ख़त्म हो जाएं, पर लोग नहीं समझते… समझना ही नहीं चाहते… रहना चाहते हैं आंखों को बन्द करके… शायद इसलिए काया की माया से दूर कायांत में उसने सुकून ढूंढा था।

ख़ैर… कुछ लगभग और 5 दिन तक मेरी सोच, मेरी समझ और मेरे सपनों के बीच एक युद्ध चलता रहा। मुझे बातें शिवांश की सुनाई आती पर सूरत अपनी दोस्त की दिखती। एक प्रिय को खोने का डर दूसरे प्रिय के लिए चिंतित करता। उसकी डिलीवरी में अभी एक महीना बाकी था। डर लग रहा था क्या होने वाला है जो बार बार वो दिख रही है।

शाम को 9 बजे के आसपास उस दोस्त का मैसेज आया। मैसेज उसके पति ने किया था कि उनको लड़का हुआ। दोस्त से दो दिन बाद बात हुई। पर इन दो दिनों में सपने नहीं आये, सपनों में वो आवाज़ें आनी बन्द हो गयी।

कैसे होते हैं न हम…ख़ुशी के आते ही पीड़ा को भूल जाते हैं। मेरा मन किसी और आशंका में था पर मैं गलत हो सकती हूँ। मैंने बस एक बार कहा था मुझे कोई तो संकेत दीजिये…कैसे समझूँ।

उस दिन अचानक उस दोस्त का मैसेज आया। उसने अपने हाथ की तस्वीर भेजी थी। मैंने पूछा

– तेरे हाथ को क्या हुआ
– कुछ नहीं, तुझे दिखा रही हूँ
– चपेटा मारेगी क्या
– पागल… हाथ पढ़ने के लिए दिखा रही हूँ
– अच्छा
– बेटे के हाथ की फ़ोटो नहीं ले पा रही तो सोचा अपने हाथ की दिखा दूँ तब तक। तुझपर ही भरोसा होता है मुझे
– ऐसे क्यों बोल रही है
– उसे देख कर मुझे तेरी याद आती है

उसकी इस बेटे से पहले की एक बेटी भी है।हम दोनों 5th क्लास से साथ है।बेटी को पिछले साल देखा था। उसकी हज़ार तस्वीरें देखी हैं। और मैं लड़कियों के लिए थोड़ी सी बाइस भी हूँ। ये बात वो बड़े अच्छे से जानती है, उसकी बेटी कि मुझसे पटती भी बहुत है पर इन दो सालों में उसने कभी नहीं कहा बेटी को देख कर तेरी याद आती है।

मैं समझ नहीं पाई ये क्या था। पर मन वो मानना चाहता है जो शायद मुमकिन ही नहीं।

कुछ दिनों बाद उसका मैसेज आया। बेटे के निक नेम के लिए। मैंने कुछ नहीं कहा क्योंकि मेरे मन में जो नाम घूम रहा था मैं उससे एक अबर फिर नहीं जुड़ना चाहती थी। फिर मैंने उसका नाम पूछा

– ऑफिसियल नाम क्या रखा है
– राम
– राम? तू कब से इतने कॉमन नेम रखने लगी
– अच्छा लगा मुझे और तुझे ऐसे ही नाम पसंद है न

उस दिन पहली और आख़री बार बार शिवांश को याद करके बस एक आंसू आंख में आया।

मैं नहीं जानती जो मैं मानना चाहती हूँ वो कितना सही है पर मन को ज़िंदा रहने के लिए एक विश्वास का होना जरूरी है झूठा ही सही पर विश्वास बेहद जरूरी है।मैंने एक विश्वास को चुन लिया है। हो सकता है समय उसे खारिज़ कर दे पर शायद तब तक मुझमें इतनी समझ आ सके कि मैं न को स्वीकार कर सकूँ। हो सकता है कल वो इस कहानी को पढ़ कर कह दे… ये शिवांश मुझे मुझ जैसा लगता है…वैरागी भी, अनुरागी भी।

ऐसे भी शिवांश कहता था “आप की कविता पढ़ कर लगता है किसी जन्म में शायद ये जिया गया है”

मैं ये शब्द फिर सुनना चाहती हूँ।  एक बार फिर से मानना चाहती हूँ शिव और राम एक दूसरे के पूरक है।

।।ॐ तत्सत्।।

परवाज़- भाग 3(सोलमेट)

“उसकी ज़िन्दगी में कई गोपियाँ थी, मीरा भी थी, राधा भी थी, और उसके वचन को मान कर उसके नाम के सिंदूर से मांग सजाने को आतुर एक रुक्मणि भी थी। पर… पर उसकी आत्मा पर एक नाम और लिखा था। वह नाम जो बेनाम ही रहा… जिसके किस्से तो सबने गढ़े पर जिसका सच अनजान ही रहा।”

– मैं समझ नहीं पा रहा हूँ
– समझना क्या है… जहाँ आपका मन है वहां रहिये
– ये मुमकिन ही नहीं…दुनिया में रह कर दुनियादारी न की जाए कैसे सम्भव है
– दुनिया की क्यों सोचनी है
– माँ तो सोचती है और मैं कुछ भी कर सकता हूँ पर माँ को दुःखी नहीं कर सकता। जहां मन रहता है वहां मैं नहीं रह सकता और जहां मैं रह सकता हूँ वहाँ मन को कैसे लगाऊं?
– अगर बात दायत्व की है तो दायत्व निभाना पहला धर्म है और अगर बात प्रेम की है तो बलिदान पहली मांग।
– आप मेरी जगह होते तो क्या करते
– सब को छोड़ देती… जो दो चीजें प्रिय हों और दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो मैं दोनों को छोड़ देती। छूट जाने के बाद भी अगर कोई साथ रह जाए तो ये उसका चयन है।
– मैं भी ऐसा ही करूंगा
– बढ़िया
– फिर हम लोग हिमालय चले जाएंगे
– और ध्यान भटकाने के लिए कोई माल भी नहीं ले जाएंगे

हंसते हंसते उसने रुक कर कहा

– आप मुझसे नाम तो नहीं पूछोगे न
– आज तक आपका पूछा जो उनका पूछुंगी
– फिर ठीक है, शुभरात्रि माँ
– शुभरात्रि

उसने उस कशमकश का नाम नहीं बताया, बस उस बार ही नहीं जितनी बार हमारी उस कशमकश के बारे में बात हुई, उतनी बार शिवांश ने वो करके ही सम्बोधित। कभी उसकी जुबान पर उनका नाम नहीं आया। ऐसा नहीं था कि मुझे वो नाम नहीं पता था, मैं अच्छे से जानती थी उस नाम को पर मुझे लगता है हम सब अपने आस पास एक लक्ष्मण रेखा हमेशा खींच कर रखते हैं…उसके भीतर जो कुछ भी है उसे झांक कर देखने की कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए। ये चीजों को जानने समझने की नहीं विश्वास करने की बात है… छानबीन करने से कभी विश्वास नहीं पनपता। विश्वास फलता फूलता ही तब है जब आप उसे प्रेरणा का जल तो देते हैं पर उस पर सवालों की औला वृष्टि नहीं करते।

क्योंकि शिवांश ने कभी उनका नाम नहीं लिया इसलिए मुझे भी उनका नाम लिखने का कोई हक़ नहीं बनता। मोहनी की तरफ उसका प्रेम आदर्श और वचन से बंधा था, बाकियों के साथ जो कुछ भी था वो शायद परस्पर दोनों पक्षों की सहमति, जरूरत या फिर अपनी अपनी पीड़ाओं से कुछ समय के लिए छुटकारा पाने जैसा था। जो भी था पर दोनों पक्ष अगर एक दूसरे के बारे में सब जानते हैं, समझते हैं साथ क्षणिक है और फिर भी क्षणिक सुख जीना चाहते हैं तो कौन सही और गलत है?

मैं शिवांश का पक्ष नहीं ले सकती क्योंकि खेल तब तक ही खेल होते हैं जब तक उसमें किसी भी पक्ष को हार-जीत है सुख-दुख का बोध न हो। उसके बाद वो प्रतियोगिता या फिर धोखा हो जाता है। इसलिए ये प्रश्न यही छोड़ देती हूँ।

पर उस दिन किसी बात पर वो बहुत गुस्से में था। और उसका मैसेज आया

– आपको मैं बुरा लगता हूँ तो लगता रहूँ पर आप ऐसे नहीं कह सकते की लड़का गलत और लड़की सही है(मेरी किसी कहानी को पढ़ कर उसे गुस्सा आया था)
– मैंने आपको क्या कहा?
– आप कोई कहानी एक पक्ष की कैसे लिख सकते हो
– मैं बस कहानी लिखती हूँ…पक्ष विपक्ष नहीं
– तो अगर मैं आपको अपना पक्ष कहूंगा तो?
– तो मैं वैसे ही लिख दूँगी जैसे आप सुनाओगे।
– एक दिन मैं आपको जरूर अपना पक्ष बताऊंगा… और आप क्या मुझे वैसे ही लिखोगे जैसे मैं समझता हूँ
– पढ़ कर ख़ुद तय करना… मैं लिखूंगी तो बिना आपसे परमिशन लिए कहीं पोस्ट नहीं करूँगी

उसने मुझे अपना पक्ष सुनाया पर तब जब उसके पास समय नहीं था कि मेरा लिखा वो पढ़ सके। वो शायद ये बात जानता था इसलिए उसने कहा

“अगर मुझे कुछ हो गया तो आप मेरी कहानी जरूर लिखियेगा”

उसने आगे कहा था

“मेरी कहानी में माँ और मोहनी जरूर होनी चाहिए”
“और बाबा भी”
“और वो लड़कियाँ भी जो मेरी ज़िन्दगी में आयी और गयी”

एक लड़की जो उसकी मीरा बनकर बैठी थी, एक लड़की जो उसकी राधा थी, एक लड़की जो उसकी रुक्मणि बनना चाहती थी और एक वो जिसका न नाम है, न पहचान। मैं बस इतनी ही लड़कियों को जानती हूँ।

मोहनी के साथ कॉलेज से शादी तक के सफ़र में बहुत उतार चढ़ाव आये। दोनों ने मिलकर उनका सामना भी किया पर एक मोड़ पर मोहनी ने उसका साथ छोड़ दिया था। परिवार और प्रेम में जब भी चुनाव आता है अक्सर लड़कियां परिवार ही चुनती हैं।

वो बेसहारा था उन दिनों और उसकी कशमकश उसे एक और कशमकश से मिलाने वाली थी। एक दोस्त की वजह से उसने उसको देखा जिसका कभी नाम नहीं आया उसकी जुबान पर। कहते हैं रूह के रिश्तों में एक बात होती है… एक महसूस करता है जिस बात को दूसरा उस बात को समझ जाता है। उन दोनों के साथ भी कुछ ऐसा ही था। शिवांश प्रेम में जो कुछ महसूस करता, उस लड़की की बातें हूबहू वैसी ही होती। पहले पहल शिवांश को उस लड़की पर गुस्सा आया, फिर आदत पड़ गयी उसकी बातों की। और एक समय के बाद ये सुनने का सिलसिला कहने समझने का सिलसिला बनता गया।

दूसरी तरफ… लहरों की तरह लड़कियां उसके किनारों तक आती और लौट जाती। शिवांश और वो लड़की प्रेम नदी के दो छोर थे। जो एक दूसरे की ओर मुँह करके खड़े तो थे पर एक दूसरे को छू नहीं सकते थे। और बीच में लहरों सी आती जाती लड़कियां।

एक वही लड़की ऐसी थी जिसके पास वो समय होने पर नहीं समय निकाल कर जाता था। एक मात्र ऐसी लड़की जिसकी बात उसने अपनी जान से प्यारी माँ से करवाई। उसकी भेजी गयी किताबें, फूल, यहां तक की पत्तियां भी शिवांश अपने सीने से लगा कर रखता था। फिर भी इस प्रेम का कोई नाम नहीं था, या फिर शायद ये प्रेम ही नहीं था। क्योंकि उसके अनुसार तो प्रेम ने हमेशा उसे छला था।

उसके प्रेम में बावली बनी मीरा/राधा सरिकी सब लड़कियों का प्रेम धोखा था उसकी नज़र में क्यूंकि उसने कहा था

– मैंने कभी किसी को नहीं कहा मैं आपसे प्रेम करता हूँ, बल्कि हर किसी को साफ साफ कहा मैं मोहनी से प्रेम करता हूँ और उससे ही विवाह करूंगा। पर उसने(उसकी एक प्रेयसी) अपनी उम्र छोड़िए ये तक नहीं बताया वो विवाहित हैं और उनके दो बच्चे हैं। एक बार मेरा फ़ोन उनके बच्चे ने उठाया तब भी पहले वो आनाकानी करती रहीं और बाद में जब मानी तो अपने घर और परिवार की दुहाई देते हुए।

मुझे पहले वो किसी ओर के प्रेम में थी। मुझसे तो बस मदद मांगी गयी थी उस शख्स को जलाने के लिए। और आप देखिएगा मेरे बाद भी वो किसी को इसी तरह टूट कर चाहेंगी।

मेरे ये पूछने पर “अगर ऐसा है तो आप ने अपना बचाव क्यों नहीं किया”

उसका जवाब था,”हमारी दुनिया में आज भी मर्द आवारा है और स्त्री की इज़्ज़त बहुत मायने रखती है… जिस तरह मुझे बदनाम किया गया अगर मैं एक शब्द भी कह दूँ तो वो कहाँ जाएंगी। मेरा तो क्या है मैं तो पुरुष हूँ न”

और वो हंसा। ओह… इस हंसी को मैं पहचानती हूँ, ये मैंने अक्सर सुनी है उन पुरुषों की हंसी जो बस इस लिए भोग रहे हैं पीड़ा क्योंकि वो पुरुष है। सुनने में अजीब लगता है पर हमारी दुनिया में पुरुष हमेशा मौन होकर पीड़ा सहते आये हैं इसलिए जब भी हमें कोई संवेदनशील ह्रदय का पुरुष नज़र आता है हम सारा दोष उस पर थोप देते हैं क्योंकि अपने आदर्शों के चलते वो किसी स्त्री पर लांछन नहीं लगाएगा। ऐसे पुरुष कम है पर जितने भी हैं उन्होमे स्त्रियों से कहीं अधिक सहा है।

एक और लड़की के लिए उसने कहा था।

– हमारे बीच सब कुछ सही था। उनसे बातें भी बहुत होती थी। जो भी उनके जीवन की स्तिथि थी पर शायद हम दोस्त तो थे, मुझे उनका प्रेम सच्चा भी लगता था पर आप ही बताओ एक व्यक्ति एक साथ दो के प्रेम में कैसे हो सकता है? वो एक ही समय पर जो बात हमसे करती थी वही किसी और से भी और जिनसे करती थी वो हमारे ही मित्र हैं।

मैंने पलट वार किया था

-आप भी तो मोहनी के होते हुए उनसे जुड़े रहे? फिर
– पर हमने साफ तो कहा… मैं प्रेम मोहनी से करता हूँ। उनका उत्तर था हमें परेशानी नहीं। हमने ये भी कहा था हम बन्ध कर नहीं रह सकते।
– वो भी बन्ध कर नहीं रहना चाहती होंगी।
– तो फिर प्रेम का ढोंग क्यों?
– जैसे आपके लिए मोहनी है, पर दूसरी लड़कियां भी। वैसे ही उनके लिए आप मोहनी की तरह इम्पोर्टेन्ट हो सकते हैं पर साथ में दूसरे लड़के भी।

वो बातों में उलझा जरूर पर 2 महीने बाद फिर यही बात उठी और उसने मुझे दो और शख्स के नाम से अवगत कराया जो उनकी उस सखी के नए मित्र थे और एक जी उनके पुराने मित्र थे। मुझे बताते हुए उसने कहा

– मैं किसी को कभी ये सब नहीं कहता पर आप मेरी माँ हैं, आपने जब मुझे गलत कह कर मुझपर प्रश्न उठाया तो मैं ये सब ले कर आया हूँ।

मेरा स्त्री मन अब भी तर्क करना चाहता था। मैं अब भी स्त्री का सम्मान करती थी, पर शायद वो सही था। लेकिन गलत मैं भी नहीं थी। और मैंने कहा

“जब बात गलत की होती है तो बात बस गलत करने की होती है बात बस गलत करने की होती है। अगर सामने वाले ने आपसे बड़ी गलती की है तो इसका मतबल ये नहीं की आपकी गलती नहीं”

वो उस दिन उदास हुआ पर एक माँ होने के नाते अपनी संतान पर ज़्यादा सख़्त होना ही मुझे सही लगा।

ख़ैर समय के साथ साथ उसने सबसे मुँह मोड़ लिया। वो मेरी नज़र में ख़ुद को सुधरता हुआ साबित करना चाहता था। साथ ही माँ, मोहनी और उनकी(जिनका कोई नाम नहीं) नज़र में अटूट विश्वास और सम्मान चाहता था। वो बदलने लगा था।

उन्हीं आत्मविश्लेषण के दिनों में उसने मुझे उनके बारे में फिर से बताया। मैं यहां एक बात और कहना चाहती हूँ कहीं न कहीं किसी वजह से मैं शिवांश की उन से नाराज़ थी। उनके बारे में बात करना तो दूर मैं सोचना भी नहीं चाहती थी।

– मैं नहीं चाहता वो रहें मेरे साथ,मेरी वजह से उन्होंने लोगों की बहुत उलाहना झेली हैं। पर मैं उनसे दूर होता हूँ तो उनकी तबीयत ख़राब हो जाती है और मेरी बेचैनी बढ़ जाती है। ऐसा लगता है जैसे कुछ है जो बांध कर रखे हुए है हम दोनों को। जिसको तोड़ना मुमकिन नहीं। हमारे रिश्तें में ऐसा कुछ नहीं जो प्रेम जैसा है पर दोस्तों जैसा भी कुछ नहीं। कोई भी दहलीज़ पार नहीं की हमने पर लगता है जैसे दरमियाँ कोई दूरी भी नहीं। मैं रात रात भर सोचता रहता हूँ… लगता है साँसों पर एक पत्थर है, जिस पर से बस जीने भर की सांस आती है। उनके जाते ही पत्थर थोड़ा और भारी हो जाता है और मुझे सांस लेना मुश्किल होने लगता है। उनके आने से थोड़ी थोड़ी सांस आनी फिर शुरू हो जाती है पर पत्थर का भार बना रहता है।
– पहले एक डिसिशन लीजिये फिर सोचेंगे उस पर कैसे कायम रहना है
– मैं चुनाव नहीं कर पा रहा हूँ, मैं चुनाव नहीं कर पाऊंगा।
– एक साथ दो नाव पर सवार भी तो नहीं हुआ जाता
– तो शायद मैं डूब ही जाऊँगा।

एक लंबी खामोशी उस दिन मैंने महसूस की। इतनी लंबी कि उसको तोड़ने में बस शिवांश को ही नहीं मुझे भी बड़ा समय लगा।

मैं उस लड़की से बात नहीं करती थी। मुझे कई बार ऐसा भी लगता था उनके पास कोई काला जादू होगा जो उन्होंने शिवांश पर किया है। कई बार मैं ये भी सोचती थी अगर वो प्यार करती हैं तो क्यों नहीं उसको आज़ाद कर देतीं। पर हमेशा की तरह मुझे भरोसा था मुझे इन सवालों के जवाब भी मिलेंगे…पर कहीं न कहीं शिवांश के लिए मेरा स्नेह उस लड़की के लिए नाराज़गी भर रहा था मुझमें।

इंसानी फितरत है, हमें अपनों की पीड़ा जल्दी समझ आती है…जिनसे कम जुड़े होते हैं उनकी देर में। शिवांश ठीक कहता था दूसरा पक्ष जानना बहुत जरूरी है।

ख़ैर… मेरी नाराज़गी इतनी नहीं थी कि मैं शिवांश के सामने फिर एक विकल्प रखती। वो पहले ही जीवन के दिए विकल्पों में उलझा हुआ था।मुझे उसे समझना ही था। पर मैं अपनी दुनिया वाली बुद्धि के चलते समझ नहीं पा रही थी। मैंने बहुत उलझी हुई प्रेम कहानियां देखी हैं… ये उन सबसे ज़्यादा उलझी हुई थी क्योंकि इसमें प्रेम साकार न होकर निराकार एउप में विराजमान था।

उन आख़री दिनों में जब हमारी बात हो रही थी और उसने उन सब के नाम कहे जिनको लिखने को उसने कहा था उसमें कहीं उस लड़की का नाम नहीं था। मैं तब तक बहुत कुछ जान समझ गयी थी। और मैं मानती हूँ जब उसने कहा “आप सब कुछ लिखना। मेरा वैराग्य भी और मेरा अनुराग भी”, तो मैं इतना तो समझ ही गयी थी यहां अनुराग का अर्थ उनसे ही है।

वो उन्हें किसी और की कलम से लिखा जाना पसन्द नहीं करता था। शिवांश को उन पर एकाधिकार चाहिए था पर वो तो जीवन ने उन्हें मिलाने से पहले ही छीन लिया था शायद इसलिए शिवांश को वो बस अपनी कलम से लिखी जानी पसंद थी। मैं उसका ये अधिकार कभी नहीं ले सकती। मैं उनका किरदार नहीं लिख सकती पर उनके बिना ये कहानी उतनी ही अधूरी है जितनी आत्मा के बिना देह अधूरी होती है।

परवाज़- भाग 2(प्रेम रोग)

“यादें धुंधला जाती हैं, पर ज़ख्म समय बीतने के साथ साथ नासूर बनते जाते हैं। प्रेम एक ऐसा ही ज़ख्म था, जो हर बार उसकी चोट पर एक और प्रहार कर के जाता, हर बार उसका दर्द थोड़ा और बढ़ा जाता। उसने प्रेम की राह में अपने अस्तित्व को भी मिटा दिया और पाया क्या…?”

– माँ
– हाँ
– मैं आपसे मिलने आने वाला हूँ दिसंबर में
– किसी खास काम से या फिर ऐसे ही?
– शादी का कार्ड देने
– मतबल उनके घर वाले मान गए?
– बात चल रही है, जनवरी या फरवरी में शादी होगी। हम सबसे पहले आपको कार्ड देने आएंगे
– फिर तो आपकी सारी गोपियाँ मेरी न?

हम हंस रहे थे समय पर और शायद समय भी हम पर हंस रहा था।

उन दोनों की मोहब्बत कॉलेज में परवान चढ़ी थी। लड़की अपने परिवार की लाडली थी और जिद्दी भी। परिवारों के रहन सहन में ही नहीं उनके आदर्शों में भी ज़मीन आसमान का अंतर था। पर जिस प्यार में मुश्किलें न हों वो प्यार प्यार कहाँ होता है।

स्वभाव से शिवांश बहुत चंचल था और उनकी चंचलता की वजह से उसकी कई महिला मित्र थीं। मैं महिला मित्र की जगह सहेलियां कह कर चिढ़ाती थी। पर फिर भी मोहनी के लिए उसका प्रेम सोच कर मैं आनन्दित हुए बिना रह नहीं पाती थी।

वो कितना प्रेम था मुझे नहीं पता… प्रेम कभी कभी दुनियादारी की सूली चढ़ जाता है और मात्र दिखावा भर रह जाता है। शायद ऐसा ही कुछ था वो भी या फिर मेरा भरम था । मैंने कभी पूछा नहीं पर एक प्रश्न उठ रहा था  मेरे मन में कि अब उन लड़कियों का क्या होगा जो उसको अपना सब कुछ मान चुकी हैं?

सवाल होते हैं तो जवाब भी होते हैं… जवाब होते हैं तो इनसे जन्म लेकर नए सवाल फिर उठ खड़े होते हैं। मेरे प्रश्न का उत्तर मिला मुझे। जब एक बार उसका अचानक रात में 11 बजे मैसेज आया

– माँ, जाग रहे हो?
– क्या हुआ?
– कुछ नहीं, बस आप से बात करने का मन हुआ?
– माँ की तबीयत तो ठीक है न?
– हाँ, सब बढ़िया है
– फिर?
– ऐसे बात नहीं कर सकते हैं क्या आपसे?
– मैंने ये नहीं कहा

फिर कुछ देर तक मैसेज नहीं आये। थोड़ी देर बाद

– माँ
– हम्म
– क्या आपको भी लगता है मैं गलत हूँ
– किस बारे में?
– किसी भी बारे में
– पता नहीं… जिन कहानियों को मैंने इकतरफा सुना है उन्हें बस सुना है… हर कहानी के उतने पहलू होते हैं जितने कि किरदार
– मेरा पहलू कोई नहीं समझता
– आप समझाने की कोशिश नहीं करते
– मैंने कभी किसी भी लड़की से मोहनी के विषय में नहीं छुपाया, बल्कि जब भी कोई लड़की मुझसे बात करना शुरू करती है मैं सबसे पहली बात यही बताता हूँ। अगर उसके बाद भी वो लोग मुझसे जुड़े रहते हैं तो मैं कहाँ गलत हूँ?
– अगर आप मोहनी से जुड़े हो तो फिर आपको किसी और से जुड़ने की क्या जरूरत है? आपको ये ज़्यादा सोचने की जरूरत है।
– मानता हूँ गलत हूँ पर क्या बस मैं गलत हूँ
– नहीं… पर अगर आप गलत हैं और आप सब से सच कह रहे हैं तो आपके साथ साथ वो सब गलत हैं जो आपके सच को जान कर भी आपसे उस तरह का भवनात्मक जुड़ाव रखना चाहते हैं। और अगर आपको लगता है आप सही हैं जो एक तरफ प्रेम में हैं और एक तरफ मस्ती कर सकते हैं तो ये रूल लड़कियों पर भी लागू होता है।
– मैं मानता हूँ… और मैंने कभी किसी भी लड़की को ख़ुद से बांध कर नहीं रखा। कभी किसी के सम्मान पर प्रश्न नहीं उठाया… फिर मुझे क्यों अपमानित किया जाता है? मेरी इमेज की धज्जियाँ उड़ा रखी हैं सबने।
– शायद इसलिए क्योंकि हम स्त्री और पुरुष को कभी एक तराजू में नहीं तोलते।
– मुझे फ़र्क़ नहीं पड़ता कोई मेरे बारे में क्या सोचता है पर बुरा इस बात का लगता है कि दुनिया जिन्हें मेरी राधा या मीरा समझती हैं… जिनके नाम से मुझे गालियां पड़ती हैं वो सच में वैसी नहीं हैं। और इस वजह से मोहनी को भी सहना पड़ा है
– दुनिया तो जब भी आपको गलत कहेगी मोहनी को सुनना ही पड़ेगा… जगजीत सिंह जी कहते हैं न “मैं जो शर्मिंदा हुआ… तुम भी तो शर्माओगी”
– पर ये गलत है
– गलत तो बहुत कुछ है
– हम्म… हम इन सब से निकलना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि शादी के बाद मोहनी को ये न लगे कि हम बंटे हुए हैं
– इससे अच्छी तो कोई बात ही नहीं
– आप मदद करोगे न
– हमेशा… करना क्या है बस आपको हड़काना ही तो है… इसमें तो मैं एकदम माहिर हूँ।

एक बार फिर हंसते हुए बात ख़त्म हुई थी। पर जितना मैं समझती हूँ इंसान का रास्ता सबसे मुश्किल तब होता है जब वो समझ जाता है वो कहीं पर गलती कर चुका है। क्योंकि तब वो प्रयाश्चित करने को बढ़ता है… दण्ड भुगतने को सज़्ज़ हो जाता है। और तब खेलती है नियति उससे।

मुझे याद है शिवांश से उन दिनों मेरी नई नई बात होनी शुरू हुई थी जब उसने मुझे माँ कहना शुरू किया था। उन्हीं दिनों बीच में उसकी तबीयत खराब हुई थी और मैंने पहली बार ख़ुद से उसे मैसेज किया था

– आपको मैसेज करने के लिए सॉरी, पर आप ठीक हैं न? तबीयत ठीक है न आपकी?

कुछ 2-3 घण्टे बाद उसका जवाब आया था।

– थोड़ा बीमार हो गए थे पर अब ठीक हैं। आप कभी भी मैसेज कर सकते हैं मुझे और कोई भी सवाल पूछ सकते हैं। पर…
– पर?
– ऐसे मत पूछियेगा कि हम जवाब देने के लिए हड़बड़ा जाऊँ। आपसे झूठ नहीं बोला जाएगा हमसे
– मैं कभी कोई पर्सनल सवाल नहीं करूँगी
– हा हा हा। हमारा मतलब वो नहीं था, बस आप हमारी हरकतों पर डांट दोगे तो हमें सुधरना पड़ जाएगा।  आपको टाल नहीं सकते।
– मैं तो ख़ुद आज तक नहीं सुधरी। बस आपकी तबीयत पूछनी थी और कुछ नहीं
– तबीयत तो ठीक हो जाएगी मन का क्या करेंगे
– मन लगा लीजिये… बस मेरी वाली पर नहीं लगाइएगा
– हा हा हा… हमको जो भी पसन्द आती हैं आप उन्हें पहले पटा लेते हैं
– हक़ है मेरा। ऐसे भी मुझे समझ नहीं आता कौन बहु है असली वाली
– उनका नाम मोहनी है
– प्यारा नाम है

उसके बाद उसने कहना शुरू किया।

“हम एक ही कॉलेज से हैं। बहुत ज़िद्दी हैं वो… उनके बाबू जी पॉलिटिक्स में हैं इसलिए माँ को ड़र लगता है इस सम्बन्ध से। एक बार तो हम भी हार गए थे पर वो हार नहीं मानती। ये उनकी सबसे ख़ास बात है। वो हमें पति भी और परमेश्वर भी समझती हैं। माँ नहीं है उनकी और बाबू जी बहुत सख़्त किस्म के हैं। इन सब मुश्किलों के चलते मिलना नहीं हो पाता उनसे। वो माता पिता की मर्ज़ी से ही विवाह करना चाहती है। जो की राजी नहीं हैं पर वो कहती हैं अगर उम्र भर भी इंतज़ार करना पड़ा तो कर लेंगे। अब आप ही बताइये इतना प्यार कौन करेगा भला”

उसकी बातों में मोहनी को लेकर गर्व था, प्रेम था, पीड़ा थी, वचन था पर फिर भी कहीं गूंजता हुआ एक निर्वात भी था। सवाल खड़ा था मेरे सामने। अगर कोई किसी से इतना प्रेम करता है कि उम्र भर उसकी प्रतीक्षा कर सकता है पर किसी और से विवाह नहीं कर सकता तो कोई बस मन बहलाने के लिए क्यों किसी के साथ है? शायद उसी निर्वात को भरने के लिए।

समय कटता जा रहा था और प्रश्न मन में कहीं न कहीं मुँह छुपाए पड़ा हुआ था। मैंने शिवांश के प्रेम में या ये कहूँ मोह में पड़ी लड़कियों को देखा। कुछ एक को उसके इस स्वभाव का इस्तेमाल कर अपने मिथ्या अभिमान को तृप्त करते भी देखा। उन लड़कियों को भी देखा जो प्रेम पथ पर शायद नई नई थी और उन्हें भी जो किसी न किसी बंधन से बन्धी हुई थी। कौन सही कौन गलत मैंने कभी नहीं सोचा क्योंकि बच्चा कोई नहीं था… न शिवांश… जो प्रेम के प्रण के साथ साथ सब के मन भी था और न ही वो सब जो उसके नए पुराने, अस्थायी और स्थायी प्रेम को जानकर भी उसको पा लेना चाहते थे।

ये जरूरतें थी… आदतें थी या कोई और वजह थी मैं नहीं जानती।न मैंने कभी जानने की कोशिश की। पर मैं इतना जानती हूँ अंत में वो अपने अतीत को बदलना चाहता था।

शायद वो हमारी आखरी लंबी बातचीत थी जब उसने कहा था

– मैं गलत रहा हूँ… और अपनी गलती की ही सज़ा भुगत रहा हूँ। शायद ये बीमारी ही मेरा प्रयाश्चित है। मुझे अपने लिए डर नहीं लगता, डर लगता है तो बस माँ और मोहनी के लिए। मैं अब सच में सुधर रहा हूँ। मैं सुधर जाऊंगा न?
– आप ठान लोगे तो सब हो जाएगा, बस हिम्मत रखिये
– हिम्मत तो बहुत है पर किस्मत नहीं है
– किस्मत बस हिम्मत का खेल है

इस बार हम दोनों ही नहीं हंसे। हसने के दिन ख़त्म होने को थे। उसकी हिम्मत दम तोड़ रही थी और उसके साथ साथ किस्मत भी उसका साथ छोड़ रही थी।

परवाज़- भाग 1(हठ योगी)

“शिवांश… नहीं उसमें शिव जैसा कुछ नहीं था। वो अधीर था, थोड़ा सा चंचल भी, सोचता बहुत था अपनी माँ, अपनी प्रेमिका, अपने दोस्तों और  अपने आने वाले कल के बारे में। पर उसकी आत्मा शिव के अंश से ही बनी थी। शिव में विलीन हो जाना ही उसकी नियति थी।”

घाट मणकर्णिका था। वहीं कहीं कोई चबूतरा सा था, जिस पर हम तीनों बैठे थे। मैं, शिवांश और उसका ही एक मित्र। देर तक बातें होती रही, जीवन की, मृत्यु की, पुनर्जन्म की, हम तीनों अपनी अपनी दलीलें दे रहे थे।

शिवांश बोला,”मैं मरना नहीं चाहता, अगला जन्म अगर हुआ भी तो सब तो भूल ही जाऊँगा न? फिर याद कैसे आएगा..”

इतना ही बोल पाया था वो कि उसे खांसी आने लगी और मेरा सपना टूट गया।

सुबह के 3 बजे ये क्या अजीब सपना देख रही थी मैं। सपने बस सपने होते हैं, क्यों सोचना इतना उनके बारे में, सोच कर लेट तो गयी पर शिवांश का खाँसना मन में रह गया।

शिवांश और मेरा खून का रिश्ता नहीं है पर ममता का रिश्ता जरूर है। उम्र में यही कोई 8-9 साल छोटा होगा फिर भी वो माँ कहता है मुझे और मैंने उसे हमेशा पुत्र ही समझा। माँ का उसकी सन्तान के साथ रिश्ता दुनिया से निराला ही होता  है। हमारा रिश्ता भी अजीब निराला है, तकरार भी होती है, नाराजगी भी होती है, पर हम कभी एक दूसरे के बीच में मनाने, सुलझाने के लिए भी किसी तीसरे को नहीं लाये।

उस दिन जागने के भी बाद भी उसकी खांसी मन से उतर नहीं रही थी। उससे ज़्यादा बात नहीं करती थी मैं, डर लगता था, ये जो कनेक्शन है आजकल के बच्चे कहां समझते हैं। उन्हें कंन्वेक्शन के नाम पर बस प्रेमी-प्रेमिका ही समझ आता है और फिर क्यों किसी पर इमोशनल अत्याचार करना। कई बार बहुत कुछ पूछने का मन हुआ उस से पर हर बार टाल दिया मैंने अपने मन को। ये अलग बात है कि अक्सर वो उन्हीं सवालों के जवाब बिना पूछे हंसते खेलते दे देता था। इसे आत्मीयता ही कहूँ तो शायद अच्छा होगा। मेरा अब भी मानना है किसी जन्ममें वो मेरा सगा पुत्र रहा होगा।

ख़ैर… उस दिन शाम तक भी मन नहीं माना तो उसे ऐसे ही मैसेज कर दिया

– कैसे हो?
– मैं ठीक हूँ माँ
– पक्का?
– हाँ… आपकी चम्पा की माँ कसम (साथ में एक हंसने वाला इमोजी भी भेजा उसने)
– फिर ठीक है
– वैसे हमें थोड़ा सा सर्दी जुखाम हुआ है
– और खांसी भी?
– आपको कौन बताया?
–  माँ के पास अपने जासूस होते हैं

फिर हम दोनों ही हंसने लगे। पता नहीं उसको वो कनेक्शन महसूस होता था या नहीं, पर कुछ तो था या हमारे बीच जो हम सवालों को अधूरा छोड़ देते थे और हमें  स्वतः सब उत्तर मिल ही जाते थे।

मैं उससे उस स्वप्न के बारे में भी बात करना चाहती थी पर मुझे सही नहीं लगा, माएँ अक्सर अपनी अनुभूतियों को अपने तक ही रखती हैं, शायद माँ होना इसे भी कहते हैं। सोचती हूँ उसे जन्म देने वाले माँ कितनी भग्यशाली होंगी।

वो अपनी माँ की कोख़ में ही था जब उसके पिता का देहांत हो गया था। एक स्त्री जिसने पति को खो कर पुत्र को पाया हो उसके लिए उसका पुत्र कितना अहम होगा कौन समझ सकता है? उसके घर में पिता की बस एक तस्वीर थी जिसे देख कर अक्सर माँ कहती

“तुम्हारी आँखें बिल्कुल तुम्हारे पिता पर गयी है। तुम्हारी किस्मत भी….”

इसके आगे वो कह नहीं पाती… एक डर था जो घेरे रहता था उन्हें। संताने और भी थीं पर शिवांश को लेकर वो अत्याधिक भावुक थीं। शिवांश को अगर काम से कभी दूसरे शहर भी जाना हो तो माँ उसे अकेले नहीं जाने देती थीं, ख़ुद भी घर बार छोड़ कर उसके साथ निकल जाती। जरा सा खांसी जुखाम क्या हुआ कभी उसे तो दुनिया जहान के वैद- डॉक्टर सब को बुला लेती। वो देर रात घर लौटे तो माँ तड़पती रहती। एक रोटी कम खा ले तो सवालों की झड़ी लग जाती।

भरा-पूरा परिवार था, मकान जायजाद की कमी नहीं थी, और शिवांश सबसे छोटा था घर में,माँ का ही नहीं सबका ही लाडला। इसलिए उसमें चंचलता थोड़ी ज़्यादा थी पर मन उसका गंभीर था। फक्कड़, भिखारी, शमशानी, जाने कैसे कैसे लोगों से दोस्ती थी उसकी। उसके इस बचपने और इन जीबों गरीब दोस्तों से माँ को डर भी लगता पर उसे रोकती भी नहीं थी। वो कई काम माँ से छुप कर करता था पर दुनिया में ऐसा कोई काम है क्या जो बच्चा करे और माँ को पता न लगे, फिर भी माँ कुछ नहीं कहती, जैसे बच्चों को माँ से छुपाने में लगता है कि हमने विश्व जीत लिया ऐसे ही अपने बच्चों की शैतानियां और उन्ही विश्व विजयी मुस्कान को देख कर माँ भी तो ख़ुश होती है। सब राज़ माँ भी बता दे बच्चों को तो कितना नीरस हो जाएगा उनका रिश्ता।

माँ, हर माँ की तरह ईश्वर में अटूट विश्वास रखती थी। दिन रात उसके लिए प्रार्थना करती रहती, और वो ख़ुद को नास्तिक कहता। मुझे नहीं याद उसने कभी भी अपने और ईश्वर के रिश्तों के बारे में कुछ कहा होगा। शायद जन्म से पहले ही ईश्वर तुल्य पिता को खो देना इसकी वजह था, या इतना सब होने के बाद भी माँ का अटूट विश्वास जिसको कभी सार्थक होते नहीं देखा उसने। वजह जो भी थी पर वो नाराज़ था ईश्वर से… उस ईश्वर से जिसके नाम पर उसका नाम रखा गया था।

एक बार उसका एक अंधकारमय उजाले से सामना हुआ था। नींद में था, स्वप्न में था या शायद ख्यालों में था। घर से दूर था… उलझन में था… अक्सर जब वो उलझ जाता था ज़िन्दगी के पेंचों में तो सब से दूर भाग जाने को निकल पड़ता था। पैसेंजर ट्रैन में सफ़र करता हुआ कहीं भी चल पड़ता। उस दिन भी गया जब सामने से उसे अंधेरे ने निगल लिया था और वो एक प्रकाश के सामने जा खड़ा हुआ था।
जो जरा सा लड़का कभी रात के 2 बजे भी श्मशान में घूम सकता था आज इतने चमचमाते उजाले से ड़र रहा था। उस प्रकाश पुंज में से आवाज़ आयी

– नाराज़ हो?
– नहीं
– विश्वास नहीं है?
– नहीं
– क्यों?
– एक वजह दो तुम पर विश्वास करने की
– मैं तुम्हारे विश्वास का मोहताज नहीं, तुम्हारी माँ के विश्वास के आधीन हूँ

वह निशब्द खड़ा रहा कुछ देर… फिर सामने से उसे एक लड़की आती नज़र आयी और चंचलता उसकी मुस्कुराहट में नाचने लगी।

लड़की से बातें करते करते ही जाने क्यों वो उस दिन लौट आया घर जहाँ उसकी माँ एक बार फिर किसी अपने को खोने की कगार पर खड़ी थीं। उस दिन वो ईश्वर का शुक्रिया करना चाहता था पर उसके अंदर के इंसान का हठ अभी ज़िंदा था। कर्म पथ पर चलता हुआ शिवांश भी एक हठ योगी ही था।

कविताएं

लिख लेने की सुध कहाँ होती है
जब लिखी जा रही होती हैं कविताएं

उस समय तो जैसे मृत पलव्वों को
गुड़ाई कर फिर से धरती के गर्भ में
भेज देने की जल्दी होती है।

कौन सोचता है शब्द
सींचते हुए
आख़री सांस लेती हुई जड़ों को

रात की मूसलाधार बारिश में
छिन्न-भिन्न हो चुकी क्यारी को पुचकारते हुए
पंक्तियां नहीं बनती कविताओं की

उस समय
जब लगता है सबको
लिख रही हूँ मैं एक भाव-विभोर कविता
मैं कविता नहीं लिख रही होती हूँ

उस समय मैं धरती के आंचल में सर रख कर
सुन रही होती हूँ लोरी
मेरी आंखों की नमी बन जाती है स्याही स्वतः
अर्धनिंद्रा में बड़बड़ाती हुई
कहती हूं जो कुछ भी मैं
लोग उसे कविता समझ लेते हैं।

ईश्वरीय प्रेम

मैंने ठान लिया था
मैं ईश्वर से कभी प्रेम नहीं करूंगी
और मैं अपने वचन पर अडिग रही
पर हुआ ये कि
ईश्वर मुझसे प्रेम कर बैठा
मुझे स्वयं तक लाने के लिए
हर जगह वो
ख़ुद को ही स्थापित करता रहा

मैं जिस से भी प्रेम करती
वो उसे अपनी छवि में ढाल देता
इस तरह उसने मेरा पूरा संसार ईश्वरमय कर दिया
पर मुझे उससे प्रेम नहीं हुआ
अंत में उसने मेरे सपनों को छला
अपनी ही एक सूरत को मेरे समक्ष लाया
और उसे मेरी आँखों में हमेशा के लिए बसा दिया

वो बस स्वप्न है… ईश्वर नहीं
यह सोच कर मैंने अपने ह्रदय में उसको बसा लिया
पर जब वो मेरी हर नज़र, हर श्वास में बस गया
तब हंसता हुआ ईश्वर बोला
“कितना भी भटक लो… मुझ तक ही तुमको आना है”

मैं अब सोचती हूं किस तरह हराऊं ईश्वर को
जो ख़ुद ही प्रेम में सब कुछ हार चुका है
मैं जीत कर भी जीत नहीं पा रही हूँ
और वो हार कर भी मुझको जीत गया है।

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